हजरत सलाहेद्दीन अली नादेर अंघा के प्रत्यक्ष नेतृत्व में स्कूल बड़ा होकर एक अंतर्राष्ट्रीय गैर-लाभ संगठन हो गया, जिसके केन्द्र (ख़ानागाह) पाँच देशों में हैं और विश्व भर में 500,000 से अधिक छात्र इससे संबद्ध हैं। स्कूल की शिक्षा सच्चे साधकों के जीवन में ज्ञान, प्रेम, शांति, नीरवता और उत्तरजीविता का संदेश देती है।
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खानेगाह- ज्ञान की पाठशाला- एमटीओ शाहमकसुदी
'खानेगाहच्च् अथवा ''खानेह-गहच्च् का अर्थ है, ''वर्तमान समय का गृहच्च्
'गहच्च् वो पवित्र क्षण है जिसमें वास्तविकता में व्यक्ति रहता है। ये वो क्षण है जहाँ पर प्रत्येक को सदा पहुँचना व आंतरिक व बाह्य प्रसार करना होता है। प्रत्यक सत्य क्षण को जीवन में खोजा जाना चाहिये न कि उसे सांसारिक कार्यों में खराब किया जाना चाहिये। वास्तविकता में ज्ञान के साम्राज्य का पथ भी ऐसे सच्चे साधकों के सोच हेतु ही खुलता है।
सलक अथवा साधक को अपने सत्य को समेटते हुए सदा उसके साथ रहना चाहिये व अन्यजनों द्वारा किये जा रहे खलल से दूर रहकर वर्तमान में रहते हुए अपने आत्म के प्रति जागरुक हना चाहिये। किसी भी प्रकार का ज्ञान प्राप्त करने के लिये प्रत्येक को शाला जाने की आवश्यकता होती है व इसके लिये ज्ञाता शिक्षक के साथ रहना ज़रुरी है। सूफीवाद के अंतर्गत ऐसी पाठशाला को खानेगाह कहा जाता है।
पुराने समय में जब व्यक्ति की ज्ञान पिपासा अटूट होती थी तब ज्ञान की तलाश में, मार्गदर्शन हेतु वह खानेगाह आया करता था।
उसके द्वारा सारे सामाजिक बंधनों को ताक में रखकर ज्ञान की उपासना की जाती थी। इसके साथ ही उसकी शुद्घ भावना से खानेगाह, ज्ञान का ऐस ाकेन्द्र बन जाता था जहाँ काल व स्थान की सीमाओं से परे आत्मज्ञान की प्रप्ति उसे उसके शिक्षक के साथी ज़िक्र के दौरान होती थी।
