मकतब तरिगत ओएसी शाह मकसूदी® इस्लाम सूफी मत के आत्मज्ञान का स्कूल है। हर मनुष्य में जानने की इच्छा बचपन से ही होती है। ये किसी विशेष जाति नस्ल या संस्कृति के लिए अकेली बाध्य नहीं है। ना ही यह किसी विशेष समय या स्थान द्वारा प्रतिबन्धित होती है। ये सूफी मत विश्व व्यापक है। जैसा कि वर्तमान सूफी गुरू हजरत सलाहेदीन आले नादर अंधा से पढाया था। ये एक ऐसा तरीका है जो मनुष्य को वास्तविकता की खोज का रास्ता दिखाता है जो कि उसके अन्दर ही विद्यमान है, ताकि वो अपने आप की सच्चाई को जान सके और समन्वय और शाँति से अपने आप में और दूसरों के साथ रह सके।
मकतब तारीघाट ओवेसी के नाम का ; शाब्दिक मतलब है ''ओवेस के रास्ते का स्कूल।'' हजरत ओएस घरानी ने पढाया कि भगवान को प्राप्त करने का सच्चा रास्ता अपने आप में खोज करना है। अपने सच्चे आत्मक जो हमारे हृदय में गहराई से छिपा हुआ है को पहचानना है। जबकि ओएस घरानी वास्तव में कभी भी अपने आध्यात्मिक अध्यापक के पास नहीं गया या उस पर नजर नहीं लगाई, हजरत मोहमद (भगवान उसको शान्ति प्रदान करें) वह अपने हृदय में जानता था। यह हृदय को हृदय से जोड़ने का तरीका एक तरह का आध्यात्मिक सम्बंध है जो कि एक विद्यमान रहना चाहिये। आध्यात्मिक गुरु जिसे ''पीर '' जाना जाता था जिसका मतलब है ''रास्ते की रोशनी'', अंधेरे से जगमग करता है ताकि खोजी अपना रास्ता अपने सच्चे आत्म प्रकाश को ढूढने के लिए पा ले।
हजरत ओएसी घारनी की अन्दरूनी पहचान के तरीके को पवित्र हजरत मोहम्मद ने ठीक पाया क्योंकि पवित्र पैगम्बर ने अपना चोला हजरत ओएसी को दे दिया था और कहा कि ''ओएसी के रास्ते अपनाओ''
हजरत ओएसी घारनी मकताब तारीघाट, शाह मकसुदी इस्लामीक सूफी मत के स्कूल का स्थापक है। प्रोत्साहित और सर्वविदित अघ्यात्मिक ज्ञान हजरत ओएसी के समय से हजरत सलाहेदीन अली नादर अगां से आगे चला गया, जो के वर्तमान स्कूल का गुरू है। ये गुरूओं की अनभिज्ञ उतराधिकारता के जरिये चला गया। जिनको के इतिहासकार और विद्वान भलीभाँति जानते है।
विद्वान 1400 वर्षों से ऊपर तक, यह सूफी गुरू विद्यार्थियों को पढाते रहें है कि वो अनुयायी ना बने, परन्तु आत्मज्ञान के द्वारा अपनी जीवनियों के गुरू बने।
शाह मकसूदी नाम के स्कूल के दूसरा भाग ओएसी स्कूल के 41वें गुरू का ज़िक्र करता है जिसका नाम हजरत शाह , मकसूद साबेग अंगा है। हजरत शाह मकसूद और उसके सूफी मत ज्ञान और दूसरे विज्ञानों के अपार अज्ञान के द्वारा सूफीमत का संदेश, पहली बार उससे बडे श्रोताओं के लिए खुला। ये उन सभी के लिए एक नेहमत थी जो कि आत्म पहचान की खोज करते थे।
पुरातन काल मे,सूफीमत एक लुप्त विज्ञान था और इसके निर्देश बिल्कुल भी प्राप्त नहीं थे। पुरातन काल में, बहुत सा आत्म अनुशासन थोडे लोगों द्वारा सहन किया जाता था। जो इस वास्तविकता को प्राप्त कर लेते थे, क्योंकि उन्हें ये प्रमाणित करना होता था कि वह प्रथम योग्य विद्यार्थी है इससे पहले की वे कोई निर्देश लें फिर भी 1960, की शुरू में हजरत शाह नकसुकुड सदेघ अघां का निवास स्थान सभी के लिए खुल चुका था। खानेगाह के द्वार खुल चुके थे और हर किसी भी नये व्यक्ति का जो सच्चाई को सुनने आता था का स्वागत किया जाता था।
हजरत शाह मकसुद हमासेह हयात (जीवन की कहानी) भी बताती है
हम मानवता के लिए ज्ञान के द्वारों को खोलने के लिए कृत संकल्प है।
उन्हें सूफी मत की इच्छा के बारे में बताओ,
और उनकी गलत धारणाओं को उजागर करो और पहचान कराओ
ज्ञान को लोगों के पथ में लालटेन की तरह प्रदर्शक बनाओ
तथा बोघ, ज्ञानवानों के मन रोश्न हों ।
ताकि वह अज्ञान को धर्म न समझे न दिखवे को
ज्ञान समझे और अनुमानों को तरीका ना समझे
वह वास्तविक इस्लाम की ओर मुडे ,
और सच्चाई के रास्ते के सिवाय कहीं ओर न चले।
तकनीक और अभ्यास आत्म-पहचान पर आधारित है जो अन्दर भगवान की पहचान करता है जो कि पवित्र पैगम्बर के काल से स्कूल के पवित्र गुरूओं द्वारा आगे बढाया गया है।
चोगा, जो प्रभु परमेश्वर की ओर से संप्रेषित ज्ञान का प्रतिनिधित्व करता है, स्कूल के पवित्र गुरुओं के माध्यम से पवित्र नबी के समय से पारित कर दिया गया है।
स्कूल के वर्तमान पीर, मौलाना हजरत सलाऊदीन मत नादर अंगा ने 4 सितम्बर 1970 को अपने पिता हजरत शाह मकसूद सादेग अंगा से चोला ग्रहण किया, स्कूल एक अर्न्तराष्ट्रीय लाभमुक्त संस्था खानेगाह केन्द्र से बन गई है, पांच महाद्वीपों में फैली है, और इसे विश्वभर में 5,00,000 विद्यार्थियों के सम्मिलित होने का गौरव है। स्कूल की विद्याओं ने सच्चे खोजियों के जीवन को ज्ञान, प्रेम, शान्ति, धैर्य और सुरक्षा का संदेश दिया है।
